
वे गोरखपुर और लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघों के अध्यक्ष रहे, जिसके चलते उनकी बड़ी पहचान बनी और यह पहचान उन्होंने सड़कों को गरम हुए बनाया था।
हमें वो कभी भगतसिंह, कभी चंद्र शेखर आजाद जैसे आंधी को बवंडर बनाने वाले क्रांतिकारी तो, कभी गांधी, लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे जनता को उत्प्रेरित करने नेता लगते थे ,किसी भी एक आदमी के अंदर इतने लोगों की तस्वीर नजर आना कुदरत का करिश्मा ही कहा जा सकता है।
स्व रवीन्द्र सिंह भष्म आंदोलनों को पुनर्जीवित करने वाले नेता थे,वो जिधर निकल पड़ते थे जवानी उधर ही चल देती थी, उनके अंदर बड़ी रेखाएं खींचने की अद्भुत क्षमता थी इसलिए लिए तो उन्होंने नेपोलियन बोनापार्ट जैसे अपने हाथ की रेखाओं का खुद ही निर्माण किया रहते था ।
महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में उनका समर्थन किसी भी छात्र नेता के जीत की गारंटी थी, उन्होंने पूर्वांचल में नेताओं की बड़ी खेप तैयार किया था इसलिए हम उन्हें राजनीति का बागवान भी कहते हैं।
उनकी राजनीतिक नर्सरी से निकले राजमणि पांडे, विश्वकर्मा द्विवेदी, शीतल पांडे, राधेश्याम सिंह सहित तमाम नेता विश्विद्यालय के अध्यक्ष और विधायक बने।
अपने अल्प कालिक राजनैतिक जीवन में उन्होंने समाजवादी युवजन सभा के समकक्ष भारतीय युवक संघ जैसा नया युवा आंदोलन खड़ा कर दिया था,यह कोई मामूली राजनैतिक फैसला नहीं था,क्यों कि उस जमाने में समाजवादी युवजन सभा की हैसियत बरगद के पेड़ जैसी थी, जिसे खाद और पानी देने का काम मधु लिमये, मधु दंडवते, जार्ज फर्नांडिस, राजनारायण, सुरेंद्र मोहन, उग्रसेन, मामा बालेश्वर, किशन पटनायक और मुलायम सिंह यादव जैसे लोगों करते थे, ऐसे लोगों की सरपरस्ती को चुनौती दे कर एक नया युवा आंदोलन खड़ा करना यह बताता है कि वो विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति थे, जिसे बनाने के लिए प्रकृति ने अलग किस्म का सांचा बनाया था, उनके लिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि "कुछ लोग थे जो वक्त के सांचे में ढल गये और कुछ लोग थे जिनके लिए सांचे बदल गये"।
जैसा कि यह बात सर्वविदित है कि जब आदमी की प्रतिष्ठा बढ़ती है और वो ताकतवर होता है तो उसके विरोध का भी स्तर वैसा ही होता है,और यह स्व रवीन्द्र सिंह जी के साथ भी हुआ तथा वो इसके शिकार भी हुए, जब गोरखपुर के कुछ स्थापित नेताओं ने चौधरी चरण सिंह के कान भर के सन् 77 में उनका विधानसभा का टिकट कटवाने का भरपूर प्रयास किया था, लेकिन यह कहावत मशहूर है कि,
"फानूस बन के जिसकी हिफाजत हवा करें,
वो शम्मा क्या बुझे जिसे रौशन खुदा करे"।
तो रवीन्द्र सिंह जी की हिफाजत तो हवा करती थी , इसलिए उनका टिकट कटवाने वाले उनके सारे विरोधी तब चारों खाने चित हो गये जब उनके टिकट का ऐलान हो गया।
उन्ही की पीढ़ी के नेता एवं श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार से सम्मानित देश के चारों सदनों का प्रतिनिधित्व करने वाले पूर्व सांसद स्व मोहन सिंह ,उन्हें युवा राजनीति का सबसे चमकीला सितारा बताते थे, जिसकी चर्चा उन्होंने उनके असामयिक निधन पर श्रद्धांजलि देते हुए अपने लेख में लिखा था जो उनके लेखों के संग्रह के रूप में प्रकाशित पुस्तक "इसलिए याद आते हैं मोहन सिंह" में प्रकाशित हुई है।
यह कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं है कि आज हमारी जवानी को जुल्म और सितम से मुकाबला करने के लिए तैयार करने वाला स्व रवीन्द्र सिंह जी जैसा कोई नेता नहीं है और इसी का खामियाजा बेरोजगारी, भुखमरी, अपराधीकरण और चाटूकारों की फौज के रूप में हम भुगत रहे हैं, बुनियादी सवालों पर युवाओं की चुप्पी यह बता रही कि अब रवीन्द्र सिंह नहीं है।, वो तूंफा की जिद देखने और उससे दो दो हाथ करने वाले तथा प्रेम चंद के पुत्र ,अमृत राय द्वारा लिखित पुस्तक "समर गाथा" के नायक जैसे लगते हैं , वे जब बोलते थे तो लगता था कि उनकी आवाज में परवरदिगार बोल रहा है।
उनकी पुण्य तिथि पर मैं उन्हें शत् शत् नमन करता हूं। स्व रवीन्द्र सिंह अमर रहे।

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